Sunday, December 4, 2011

Invasion of Goa





क्या आप जानते हैं गोआ एक Portuguese (पुर्तगाली) Colony था? आप कहेंगे "अच्छा तो था तो कौनसी बड़ी बात थी? भारत में उस समय बहुत सारी विदेशी ताक़तें थी" | जी हाँ, Goa का पुर्तगाली उपनिवेश होना कोई बड़ी बात भले ही ना हो, पर उसको कैसे आज़ाद कराया गया, वह जरूर ख़ास है |

Goa से पुर्त्गालों की रवानगी किसी "पुर्त्गालों भारत छोडो" आन्दोलन या राजनीतिक समझौते से नहीं बल्कि सैन्य आक्रमण (Military Attack) से हुई | 1947 में भारत की आज़ादी के बाद भारत के एकीकरण के तहत अनेकों छोटी बड़ी सियासतों को काफी प्रयत्न के बाद भारत गणराज्य में मिलाया गया | सरदार वल्लभ भाई पटेल की इसमें बहुत बड़ी भूमिका रही | इसके बाद सन 1950 में भारत ने पुर्तगाली सरकार से भारत में पुर्तगाली राज्यों के भविष्य के विषय में चर्चा करने का प्रस्ताव रखा | परन्तु पुर्तगाल ने प्रस्ताव ठुकराते हुए कहा,    
"Its (Portuguese) territory on the Indian subcontinent was not a colony but part of metropolitan Portugal and hence its transfer was non-negotiable; and that the India had no rights to this territory since the Republic of India did not exist at the time when Goa came under Portuguese rule."

जवाब में भारत ने कई कूटनीतिक उपाय करने का प्रयत्न किये और यह मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय गलियारों तक पहुंचा | अमेरिका सहित कई मुल्कों ने भारत को यह मुद्दा शांतिपूर्वक हल करने की सलाह दी | जब 10 दिसंबर 1961 को नेहरु ने कह दिया की गोआ में पुर्तगाली राज्य का बने रहना असंभव है तब अमेरिका ने भारत को चेताया की भारत ने अगर कोई सैन्य कार्यवाही की तो यह मुद्दा UN Security Council में उठाया जायेगा और अमेरिका उसमें भारत का कोई समर्थन नहीं करेगा |


दबाव के बावजूद भारत ने अपनी तीनों सशस्त्र सेनाओं के साथ 18 दिसम्बर 1961 को Operation Vijay के तहत गोआ पे आक्रमण किया जिसमें ज़मीनी, हवाई और समुद्री आघात शामिल थे जो की छत्तीस घंटो से ज्यादा चले | बाद में पुर्तगाल के समर्पण के बाद हमला शांत हुआ और Goa, Daman and Diu और Dadra and Nagar Haveli से पुर्तगाली राज्य समाप्त किया गया |

भारतीय आक्रमण की विश्व भर में मिली जुली प्रतिक्रिया रही | अमेरिका, पाकिस्तान, और कुछ यूरोपीय देशों ने आक्रमण की निंदा की जबकि रूस और कई अफ़्रीकी देशों ने भारतीय कदम की जमके प्रशंशा की | चीन ने प्रशंसा या निंदा ना करते हुए अपने व्यक्तत्व में ओप्निवेशिक साम्राज्यवाद का विरोध किया | पुर्तगाल के अनुरोध पे और अमेरिका के सहयोग से 18 दिसम्बर को UN Security Council का आपातकालीन सत्र बुलाया गया जिसमें फ्रांस, UK और तुर्की के समर्थन से भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाया गया कि भारत Goa पे आक्रमण रोके और वहां से अपनी सारी सेना हटाके पुर्तगाल से वार्ता शुरू करे | परन्तु इस प्रस्ताव के खिलाफ रूस ने अपना Veto इस्तेमाल किया और प्रस्ताव ख़ारिज हुआ |

हांलाकि यह कोई बहुत बड़ा युद्ध नहीं था, फिर भी एक सैन्य आक्रमण तो था ही | इस युद्ध कहीं निंदा तो कहीं प्रशंसा हुई पर जो भी हो भारत ने वही किया जो समय कि जरुरत थी | अमेरिकी राजदूत J.K. Galbraith ने खुद कहा था, 
"The casualties were minimum. I am in favour of all wars being like the war between India and Portugal -- peaceful and quickly over!" 

आज़ादी के बाद भी किसी देश की ज़मीन पे कब्ज़ा करके बैठे विदेशी अगर उस देश की ज़मीन छोड़ने की सोचना तो दूर बल्कि वार्ता का प्रस्ताव भी ठुकरा दें तो उस देश को अपनी अखंडता बनाये रखने के लिए युद्ध का मार्ग चुनना ही पड़ेगा | जिन लोगों और देशों ने भारत की निंदा करते हुए यह कहा की दुनिया को शांति का पाठ पढ़ने वाला देश आज खुद अशांति के मार्ग पे चल रहा है, उन्होंने शायद गीता नहीं पढ़ी जिसमें सत्य और धर्म की रक्षा के लिए अर्जुन ने अपने ही संबंधियों की खिलाफ धनुष उठाया था | यह उसी गीता का भारत है और यह भारत की वही गीता है जिसके ज्ञान की ज्योति से आज सिर्फ भारत ही नहीं वरन पूरा विश्व प्रकाशमान है |

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